Saturday, 11 July 2020

अकेला

पूरा जमावड़ा इकट्ठा हो गया था शंकर के घर के बाहर, कुछ लोग घर के आंगन में जमा थे तो कुछ लोग बाहर गली, धीरे-धीरे बात पूरे गांव में पहुंच गई थी। शंकर बहुत बिलख-बिलख कर रो रहा था। शंकर को रोता देख और इतनी सारी भीड़ को देख शंकर का सात माह का बच्चा भी जोर जोर से रोने लगा। लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। कोई कह रहा था कि इस बिन माँ के बच्चे का क्या होगा अब? तो कोई कह रहा था कि बच्चा ही क्या अब तो शंकर भी फिर से अकेला हो गया। तभी पड़ोस की रौशनी काकी ने कहा कि शायद इस बदनसीब की किस्मत में किसी का न तो प्यार ही लिखा है और न साथ ही, बड़ा ही अभागा है ये...माँ-बाप के बाद तुलसी इसकी साथी थी अब वह भी..., लोग आपस में कानाफूसी कर ही रहे थे कि अचानक वहां पुलिस आ जाती है। गांव के सरपंच ने थाने में खबर भिजवा दी थी। पुलिस वाले भीड़ को हटाते हैं -"पीछे पीछे हटिये सभी...यहां इतनी भीड़ इकट्ठा मत कीजिये प्लीज। अपने अपने घर जाइये। ये पुलिस केस है। आप लोग सभी घर से बाहर निकलिए। चलिए हटिये...." ऐसा कहते हुए पुलिस वाले घर के अंदर दाखिल हो जाते हैं। पूरे गांव में जैसे शौक छा गया था। सभी गांव वाले शंकर को बहुत चाहते थे। क्योंकि शंकर एक बहुत भला लड़का था। सभी गांव वाले से सबकी अच्छी बनती थी। आजतक कभी भी किसी से थोड़ी सी तू-तू मैं-मैं भी नही हुई थी। गांव का कोई भी व्यक्ति शंकर को कभी भी कोई काम कहता तो शंकर उसे खुशी-खुशी कर देता था। शंकर बहुत ही मेहनती भी था। शंकर के स्वभाव और उसके व्यवहार के कारण पूरा गांव उसे बहुत पसंद करता था। इसलिए जैसे ही बात गांव में फैली पूरा गांव धीरे-धीरे शंकर के घर के बाहर जमा हो गया था। शंकर पूर्णमल और कमला एक एकलौता ही बेटा था। जब वह करीब 13 साल का था तब उसके पिता ने आत्महत्या कर ली थी। 2 साल तक लागतार फसल अच्छी नही होने के कारण उसके पिता ने बैंक से कुछ कर्जा लिया था। और वह कर्जा समय पर बैंक को नही दे पाया इसलिए हर महीने उसे बैंक से नोटिस आने लगे। बैंक को किसी भी नोटिस का जब कोई जवाब नही मिला तो एक दिन बैंक अधिकारी के साथ बैंक के कुछ कर्मचारी पूर्णमल के घर आये और उसे कहा कि अगर उसने एक महीने के अंदर बैंक का पूरा पैसा नही दिया तो बैंक उसका घर या खेत बेच कर पैसा वसूल कर लेगा। जब बैंक के लोग पूर्णमल के घर आये थे तब आसपास के लोग भी वहां जमा हो गए थे। इस बात के कारण पूर्णमल को बहुत शर्मिंदगी हुई। उसे लगा कि पूरे गांव में ये बात फैल जाएगी। उसे लगा कि बैंक के लोग गांव वालों के सामने उसका अपमान करके चले गए और वह यह बात सह नही पाया। पूर्णमल शाम तक खेतों से वापस घर आ जाता था। पर आज अंधेरा हो गया लेकिन पूर्णमल अभी तक खेत से वापस नही आया तो कमला को बहुत चिन्ता हो गयी। उसने पड़ोस के एक आदमी को खेत मे जाकर देख कर आने को बोला। उसने कमला को परेशान देखा तो वह उसी वक़्त खेत मे जाकर देख आया। पर पूर्णमल खेत में नही था। अब तो कमला को और भी फिक्र होने लगी थी। गांव के दो-चार लोग पूर्णमल को ढूंढने निकले उन्होंने गांव का चप्पा-चप्पा छान लिया पर पूर्णमल का कहीं कुछ पता न चला। लगभग आधी रात बीत चुकी थी पर कमला अब भी घर के दरवाजे पर खड़ी सोच रही थी शायद पूर्ण इधर से आएगा। शायद पूर्ण उधर से आएगा। शंकर भी अपनी माँ के साथ ही माँ का पल्लू पकड़े खड़ा था। कमला उसे बार बार कह रही थी कि तू जाकर सो जा मैं तेरे पिता जी के इंतजार में खड़ी हूं। पर शंकर भीतर नही गया। वो भी अपनी माँ के साथ ही खड़ा रहा। तभी पड़ोस के काका ने कमला से कहा कि बिटिया रात बहुत हो गयी है तुम भीतर चली जाओ। कुछ लोग शंकर की तलाश में लगे हैं। जैसे ही कुछ खबर मिलेगी तो तुम्हे बता देंगे। कमला बुर्जुग की बात रखते हुए भीतर तो चली गयी पर उसे चैन कहाँ था। कभी आंगन में तो कभी छत पर जाकर खड़ी हो जाती। अब तो उसके मन मे बुरे बुरे ख्याल आने लगे। वो सोच रही थी कि बैंक वालों की बात का बुरा लगा था। कहीं कुछ कर तो नही लिया उसने। और आज दोपहर खाना भी तो नही खाया था। तो कभी सोचती की कहीं चला तो नही गया वो उसे और शंकर को छोड़ कर, अब इसी उधेड़बुन में रात भीत गयी और भोर हो गयी। इधर-उधर से गाय भैंसों की आवाजें आने लगी। बाहर सड़क पर भी चहल-कदमी का आभास हो रहा था। उसने दरवाजा खोला और फिर से दरवाजे पर खड़ी हो गयी शायद कोई अभी कुछ बता दे पूर्णमल के बारे में..., पर सब लोग इधर-उधर जाने वाले कमला को देखते हुए निकल जाते पर कोई कुछ न कहता। थोड़ी देर बाद कमला की ही हमउम्र रौशनी वहां आयी और बोली-"कमला तू रात से परेशान है चल आजा चाय पी ले।" कमला ने कहा-"नहीं जीजी, जरा भी इच्छा नही हो रही है। आप ही पी लीजिए" "मुझे कुछ नही सुनना, साथ चलना पड़ेगा।शंकर को भी साथ ले ले और चल हमारे घर..." रौशनी कमला और शंकर को जिद करके घर ले जाती है और उन्हें चाय पिलाती है। कमला चाय पी ही रही थी कि पड़ोस का मनोहर घबराया सा आता है और कहता है-"भाभी मैं आपको आपके घर देखने गया था। पर आप वहां नही थी। फिर पता चला कि आप रौशनी भाभी के घर हैं।" कमला उसे देख कर चाय का कप छोड़ कर खड़ी हो जाती है और डरे और घबराए स्वर में कहती है-"क्या हुआ मनोहर जी, तुम्हारे भैया तो ठीक है न? आप इतने घबराए क्यों है?" "भाभी वो भैया खेत में...., आप चलिए साथ।" अधूरी बात कह कर मनोहर बाहर जाने लगता है। कमला भी मनोहर के पीछे पीछे जल्दी जल्दी कदम बढ़ा कर चल पड़ती है। शंकर भी मां के साथ हो लेता है। कमला बार बार मनोहर से अपने पति के बारे में पूछ रही थी। कि क्या हुआ है? सब ठीक तो है न..? आप जवाब क्यों नही दे रहे हैं? खेत में क्या हुआ है? मेरा दिल बैठे जा रहा है मनोहर जी आप कुछ बताए।' पर मनोहर कभी चुप रह जाता। तो कभी सिर्फ इतना ही कहता कि आप चलिए तो सही सब बताता हूँ। थोड़ी देर बाद वो पूर्णमल के खेतों के करीब पहुंच गए। दूर से कमला को लोगों की भीड़ नज़र आने लगी। भीड़ देख कर कमला के जैसे प्राण ही निकल गए। अब उसके शरीर मे इतनी भी जान नही रही कि वो भीड़ तक जा सके। अब तो सांस भी फूल गयी। कभी किसी अनहोनी का ख्याल आता दिल मे तो कभी दिल को समझा लेती ये सोच कर कि भगवान सब ठीक करेगा। पर जैसे ही वह भीड़ के करीब पहुंची तो लोगों की फुसफुसाहट तेज़ हो गयी। सब लोग कमला को दया की दृष्टि से देखने लगे। और पीछे पीछे सरक कर रास्ता बनाने लगे। कुछ लोग खेत के कुएं में झांक रहे थे। कमला भी तेजी से जाकर कुएं में झांकने लगी और देखा शायद कुएं में कोई आदमी तैर रहा है। कुएं की गहराई ज्यादा थी इसलिए उस आदमी की पहचान कर पाना मुश्किल था। पर अब कमला के शरीर और हौंसले ने बिल्कुल जवाब दे दिया था। अब तो तय हो ही गया कि ये कुएं में तैरती लाश पूर्णमल की ही है। कमला दहाड़े मार कर रोती है। और जमीन पर बेसुध होकर गिर जाती है। वहां कुछ महिलायें भी थी तो वो कमला को संभालती है और अपने साड़ी के पल्ले से उसकी हवा करने लगती है। शंकर भी कुएं में देखता है और वहां से भाग जाता है। मनोहर शंकर के पीछे पीछे जाता है। थोड़ी देर बाद पुलिस भी आ जाती है। गांव के लोगों ने पहले ही पुलिस को खबर कर थी। लोगों की मदद से लाश को निकाला जाता है। और जिसका डर था वही होता है। ये लाश पूर्णमल की ही है। पूर्णमल बैंक के कर्मचारियों द्वारा किया गया अपमान सह नही पाता है और कुएं में कूद कर अपने प्राण दे देता है। शंकर की माँ ये सब सह नही पाती है। और उसे भारी सदमा पहुंचता है। वो गुमसुम सी रहने लगती है। तेहर वर्ष की आयु में ही शंकर का स्कूल भी छूट जाता है। शंकर अपनी माँ के साथ खेतों के काम मे लग जाता है। पर कुछ दिनों बाद कमला भी बीमार रहने लगती है। धीरे धीरे कमला एक औरत से एक ढांचे में बदल रही थी। अब तो उसकी हड्डियों पर सिर्फ चमड़ी ही बची थी। शरीर से मास तो खत्म ही हो गया था। बस मानो जिंदा लाश है। शायद पति के मरने के बाद कमला ने भी जीने की इच्छाशक्ति खो दी थी। अब वो जीना ही नही चाहती थी। और पांच साल बाद एक दिन कमला भी शंकर को छोड़ कर शंकर के पिता के पास चली जाती है। अब शंकर बिलकुल अकेला हो गया था। बच्चों के साथ खेल-कूद और स्कूल तो पहले ही बंद हो गए थे। अब तो शंकर ने घर से बाहर ही निकलना छोड़ दिया था। पड़ोस की रौशनी का बेटा भी शंकर की ही उम्र का था। वो साथ स्कूल जाते थे। पर शंकर का स्कूल छूटा तो रौशनी के बेटे 'अमोल' का आना जाना भी कम हो गया था। अमोल अब इंटर के बाद कॉलेज जाने लगा था। अमोल ने फिर से शंकर से दोस्ती की और फिर से वो हर रोज शंकर से मिलने जुलने लगा। कभी कभी वो शंकर के घर भी सो जाता। और जब कॉलेज की छुट्टी होती तो शंकर के साथ खेत मे जाकर मदद भी कर देता।अब शंकर भी थोड़ा खुश रहने लगा। दो-तीन साल अच्छे से बीते उसके बाद अमोल की पढ़ाई पूरी हो गयी और वह नौकरी करने शहर चला गया। शहर में अमोल की बुआ रहती थी। उसी ने अमोल को बुला कर उस फैक्ट्री में नौकरी लगवा दी जहां अमोल के फूफा जी नौकरी करते थे। दोस्त के जाने के बाद शंकर फिर से अकेला हो गया था। शंकर को फिर से उदासी ने घेर लिया था। सोचता रहता कि किसके लिए जिऊं और क्यों जिऊं। इतनी बड़ी दुनियां में उसका कोई भी अपना नही है। एक-दो साल शंकर के ऐसे ही अकेले बीते। उसके बाद शंकर के व्यवहार और शराफत को देखते हुए आपस मे सलाह करके गांव वालों ने एक अच्छी लड़की देख कर पड़ोस के ही एक गांव में शंकर की शादी करवा दी। जितना भला और सीधा शंकर था, तुलसी भी बिल्कुल शंकर के जैसी ही थी। बहुत ही सुशील, समझदार और खूबसूरत भी थी। शंकर के जीवन से जैसे अंधेरा छट चुका था। अब उसे जीने का मकसद मिल गया। शाम को खेत से आता तो कोई उसका घर पर इंतजार करता था। मां के मरने के बाद कभी अच्छा खाना भी नसीब नही हुआ था। अच्छा-बुरा खुद से ही बना कर खाता था। और रोज रोज बना कर भी कौन देता ? आजकल किस को किसकी पड़ी है। सब अपने मतलब से बात करते हैं। अब शंकर के जीवन में खुशियां आ गयी थी। शंकर अब पिछली सब बातें भूलने लगा था। और तुलसी के साथ हंसी खुशी रहने लगा। जल्दी ही दोनों में बहुत प्रेम हो गया। शंकर तुलसी को एक भी दिन मायके नही जाने देता था। अगर तुलसी के घर से कोई तुलसी को कुछ दिन के लिए लेना आता भी तो शंकर कह देता कि मैं खुद मिलवाने ले आऊंगा। और अगले दिन तुलसी को लेकर जाता उसके मायके और शाम को वापस भी आ जाता। तुलसी बहुत खुश थी शंकर के साथ इसलिए इस बात की कोई शिकायत या नाराज़गी उसके घर वालों ने नही दिखाई कि तुलसी को मायके नही भेजता शंकर..., जीवन हसीं-खुशी से बीत रहा था। शादी को एक साल हो गया था। और अब शंकर की खुशियां भी दोगुनी हो गयी थी। क्योंकि तुलसी मां बनने वाली थी। शंकर और तुलसी के साथ साथ पूरा गांव भी शंकर के बच्चे की बाट जोह रहा था। शंकर तुलसी का बहुत खयाल रखता। उसे घर के काम भी नही करने देता था। बच्चे के आने के चाव में घर में बहुत से खिलोने भी इकट्ठा कर लिए। पालना ले आया...बच्चे के नाम सोचने लगा कि लड़का होगा तो ये नाम होगा और लड़की होगी तो ये नाम होगा। और वो दिन भी आ गया जब शंकर बाप बन गया। तुलसी ने एक खूबसूरत बेटे को जन्म दिया। शंकर की ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा। उसने पूरे गांव में लड्डू बंटवा दिए। गांव वाले भी खुश थे। अब शंकर का पूरा परिवार बन गया था। घर मे पूजा-पाठ हवन आदि किये गए। पंडित जी ने शंकर को कई नाम सुझाये पर शंकर को 'चिराग' नाम बहुत पसंद आया। बच्चे का नाम चिराग रखा गया। अब शंकर पुराने दर्द भूल चुका था। शंकर के जीवन में केवल खुशियां ही थी। अच्छी पत्नी मिल गयी और दो साल में भगवान ने एक प्यारा सा बेटा भी दे दिया था। गरीब होने के बावजूद भी वो दोनों बहुत खुश थे। समय इसी तरह से अच्छे से बीतता रहा। चिराग अब छः माह का हो गया था। पर किसान का जीवन इतना आसान भी कहाँ होता है। न जाने कितनी ही चुनोतियाँ उसके जीवन मे होती है। हर साल कुछ न कुछ मुसीबत खड़ी रहती है। कभी सूखा तो कभी बाढ़ तो कभी आंधी और कभी ओले फसल खराब कर देते हैं। इस बार शंकर के साथ ऐसा ही हुआ। फसल कटाई का वक़्त नजदीक था और बेमौसमी बारिश ने खड़ी फसल बर्बाद कर दी। बारिश भी बहुत ज्यादा थी। लगातार तीन दिन बारिश होती रही और खेतों में पानी भर गया। पूरी फसल खराब हो गयी। शंकर बहुत परेशान रहने लगा। शायद घर के लिए ही अनाज हो सके। खाने के अलावा और भी बहुत खर्चे होते हैं घर में, और अब तो छोटा बच्चा भी है। शंकर सोच रहा था किसी से उधार लेले कुछ पैसे...पर ले तो किससे? क्योंकि ज्यादा बारिश के कारण सभी की फसल खराब हो चुकी थी। बस यही सब सोच कर शंकर चिड़चिड़ा सा हो गया थोड़ा...शंकर को परेशान देख कर एक दिन तुलसी ने कहा कि उसके मां-बाप ने जो थोड़े गहने दिए थे तुम वो बेच दो। गहने तो बाद में भी बन जाएंगे। ये बात सुनकर शंकर भड़क गया और आज दो-चार बात तुलसी को सुना डाली। तुलसी ने पहली बार शंकर को इतने गुस्से में देखा। उसे बहुत बुरा लगा। फिर उसने सारा गुस्सा चिराग पर उतार दिया। चिराग बार-बार गोद में आने के लिए रो रहा था। तुलसी को बहाना मिल गया और उसने दो-चार चमाट चिराग को जड़ दिए। अब तो शंकर को और गुस्सा आ गया। और उसने तुलसी से कहा-"बच्चे को क्यों पिट रही हो? हम पर गुस्सा हो तो हमें मारो ना? उठाओ लठ्ठ जड़ दो हमें...." तुमसी भी बहुत गुस्से में थी और उसने भी गुस्से से कहा-"तुम ही मारो हमें, आज इतनी बात जो सुना दी है तो मार-पिटाई में क्यों पीछे रहो। वो काम भी कर दो आज...।" शंकर चिल्लाते हुए-" क्या सुनाया है तुमको? अब इतने बुरे हालात नही है हमारे कि पत्नी के गहने बेच दें। बस यही तो बोला कि गहने नही बेचने" तुलसी-"बस इतना ही बोला? चलो ठीक है बात खत्म करो। गहने नही बेचेंगे। मैं बाबा से कुछ पैसे उधार ले आती हूं.....।" शंकर ने तुलसी की बात भी पूरी नही होने दी और फिर चिल्ला उठा-" क्या बोली तुम...? अरे साला अब तुम हमको भिखारी समझती हो। अपने बाप से पैसे मांगोगी? बदनामी करवा दो हमारी। तुम्हारे घर वाले सोचेंगे कि मैं तुमको रोटी भी नही खिला सकता। इतना निकम्मा नाकारा हो गया हूँ मैं...?" मां बाप को लड़ता देख चिराग और जोर से रोने लगता है। पहले से भड़की तुलसी फिर से चिराग को एक थप्पड़ लगाती है। इस बात पर शंकर को बहुत ज्यादा गुस्सा आता है और वो तुलसी की तरह हाथ उठाता है। पर खुद को कंट्रोल करके मुठ्ठी बंद कर लेता है। उसके बाद गुस्से से बाहर खेत मे जाना लगता है पर जाते जाते गुस्से में तुलसी को कहता है-"इतने छोटे बच्चे को मार रही हो। वो कुछ समझता भी है क्यों मारा किस लिए मारा? हमारा गुस्सा बच्चे पर उतार रही हो। अगर इतनी ही दुखी हो गयी हमसे तो जाओ अब हमको अपनी सूरत मत दिखाना।" ऐसा कहकर शंकर चला जाता है। शंकर पूरे दिन खेत मे बैठा रहता है। तुलसी को शंकर की बात चुभ जाती है। बार बार उसके कानों में वही शब्द गूँजते है 'अब अपनी सूरत मत दिखाना मुझे' सारा दिन यही सब सोच कर और रो-रो कर इसी तरह बीत जाता है। शाम को तुलसी पड़ोस की काकी को चिराग देकर आती है ये कहते हुए कि काकी आप चिराग को थोड़ी देर के लिए संभाल लो। उसे कुछ काम है वह थोड़ी देर में आकर चिराग को ले जाएगी। काकी आधे पौने घंटे चिराग को खिलाती है। उसके बाद चिराग रोने लगता है। काकी चिराग को तुलसी को देने उसके घर आती है। आंगन का दरवाजा खुला है। घर मे कुंडी लगी है। तुलसी कहीं दिखाई नही दे रही। काकी तुलसी को एक-दो आवाज लगाती है और वापस अपने घर चली जाती है। उधर पूरा दिन शंकर तुलसी के बारे में सोचता रहता है कि उसने तुलसी के साथ गलत किया। उसे ऐसा नही करना चाहिए था। वो तो उसकी मदद ही करना चाहती थी। अगर मुझे मदद नही लेनी थी तो मैं उसे मना भी तो कर सकता था। इतना गुस्सा होने की क्या जरूरत थी। उसने खाली मकान को घर बनाया। कितना प्यार दिया उसे। हर हाल में उसके साथ खुश रहती है। कभी किसी चीज की मांग नही की। ढाई साल में मुझे अकेला छोड़ कर एक भी दिन अपने मायके नही गयी। और मैंने इतना उल्टा सीधा सुना दिया उसे। मैं घर जाकर हाथ जोड़ कर माफी मांग लूंगा। और वादा करूंगा कि आज के बाद कभी तुलसी से ऊंची आवाज में बात तक नही करूंगा। यही सब सोच कर शंकर अपने घर की ओर जाने लगता है। रास्ते मे हलवाई की दुकान दिखती है जिस पर गर्म गर्म जलेबियाँ बन रही है। शंकर जेब मे हाथ डालता है। जेब मे सिर्फ दस का नोट है। फिर भी शंकर दस रुपये की जलेबी ले लेता है अपने आप को ये कहते हुए कि 'जिसने चोंच दी है, चुगा भी वही देगा।' शंकर घर पहुंचता है पर उसे तुलसी कहीं दिखाई नही देती है। तुलसी को घर न पाकर वह इधर-उधर ढूंढता है। और आवाज भी लगता है। उसके बाद छत पर देख कर आता है। पर तुलसी उसे कहीं दिखाई नहीं देती है। मन ही मन सोचता है शायद गुस्सा होकर मायके तो नही चली गयी। पर वो आजतक उसके बिना कहीं नही गयी। उसके बाद वह पड़ोस की रौशनी काकी के घर जाता है। रौशनी 'शंकर की माँ कमला' की सहेली थी।जहाँ तुलसी का ज्यादा आना जाना था। जैसे ही शंकर रौशनी काकी के घर में जाता है। 'चिराग' शंकर को देख कर जोर जोर से रोने लगता है। शंकर रौशनी काकी से कुछ पूछता उससे पहले ही रौशनी 'शंकर' को देख कर कहती है-"तुलसी कहाँ है शंकर ? कितनी देर पहले चिराग को देकर गयी थी। उसके बाद लेने नही आई और घर पर भी नहीं है। उसको बच्चे की कोई चिंता नही कि बच्चा दो घंटे से भूखा है।" शंकर रौशनी की बात सुनकर हैरानी से पूछता है-" क्या..? तुलसी आपके घर नही हैं। कहां गयी वो? मैं भी उसे कब से ढूंढ रहा हूँ।" रौशनी-"तुमको भी नही पता क्या? कहाँ चली गयी?" अब शंकर को चिंता होने लगी क्योंकि अगर वो मायके जाती तो चिराग को साथ ही लेकर जाती। अकेले कभी नही जाती। अब शंकर को बार बार उसकी कही बात याद आती है। सुबह उसने कहा था कि 'मुझे अपनी सूरत मत दिखाना'... शंकर सोचता है कि तुलसी ने कुछ उल्टा सीधा तो नहीं कर लिया। पर वो खुद को ही जवाब देता है। इतनी सी बात के लिए कोई कुछ करता है क्या? और तुलसी मुझे और चिराग को बहुत प्यार करती है। वो हम दोनों को छोड़ कर कहीं नही जाएगी। उसके बाद शंकर और रौशनी अड़ोस-पड़ोस के घर में पूछने लगे। पर किसी को कुछ भी नही पता था। शंकर फिर से घर जाकर देखता है कि शायद अब घर आ गयी होगी। पर अब भी कहीं भी तुलसी दिखाई नही देती है। घर के एक कोने में भैंस का बाड़ा बना था। भैंस के बाड़े के पास एक कच्चे कमरे में भैंस का तुड़ा (भूसा) भरा था। इस कमरे में सिर्फ भैंस का चारा निकालने के लिए ही जाते हैं। शंकर उस कमरे की और जाता है। और सोचता है कि इतनी गर्मी में वो तूड़े के कमरे में क्या करेगी। और काकी बता रही है कि दो तीन घंटे से लापता है। जैसे ही शंकर कमरे के दरवाजे को धक्का देता है। शंकर के होश उड़ जाते हैं। सामने तुलसी फंदे से झूल रही थी। उसने अपनी ओढ़नी से फांसी लगा ली थी। शंकर जोर से चीखता है। और उसके पैर पकड़ कर जोर जोर से रोने लगता है। रौशनी भी शंकर की आवाज सुनकर अंदर आती है और वो भी तुलसी को इस हाल में देख कर हैरान और बहुत दुखी होती है। शंकर के रोने की आवाज सुनकर गांव के लोग भी आने लगते है। और सभी ये सब देख कर यकीन ही नही करते है कि तुलसी ऐसा कुछ कर सकती है। सबके मन मे तरह तरह के सवाल आने लगते है कि ऐसी क्या बात हो गयी जो तुलसी ने ऐसा कर लिया। सब लोग दुःखी होते हैं पर ये बात जानने के लिए ज्यादा दिलचस्पी दिखातें है कि तुलसी ने ऐसा क्यों किया? दोनों के बीच घनिष्ठ प्यार होने पर भी कोई ऐसा कैसे कर सकता है? शंकर रोते हुए बार-बार एक ही बात दोहरा रहा था कि इतनी सी बात पर तुमने ऐसा क्यों किया? अगर मैंने गुस्से में कुछ कह दिया था तो अपनी माँ के घर चली जाती। कभी बात ही न करती मुझसे...मुझे छोड़ देती। पर तुम संसार ही छोड़ कर चली गयी। ये भी नही सोचा के कैसे जीऊंगा तुम्हारे बिना मैं, मेरा ना सोचती पर कम से कम इस मासूम के बारे में तो सोचती एक बार...तुलसी तुमने तो माफी मांगने का मौका भी न दिया मुझे, तुम वापस लौट आओ। आज के बाद कभी तुमसे ऊंची आवाज में बात भी न करूंगा। चिराग की 'सोगन' तुलसी...कभी तुमसे कुछ न कहूंगा। तुम वापस आ जाओ। तभी भीड़ में पुलिस के आने की सुरसुराहट होती है। एक आदमी शंकर के कान में फुसफुसाता है कि पुलिस आ गयी है तुम चुप हो जाओ। पुलिस घर के अंदर आकर पूरे घर का मुआयना करती है। शंकर के साथ-साथ दो चार लोगों से भी अलग अलग पूछताछ करती है। बॉडी को पोस्टमार्टम के लिए हस्पताल ले जाया जाता है। शंकर को भी पुलिस अपने साथ ले जाती है। अगले दिन तुलसी के माता-पिता और गांव वाले शंकर के पक्ष में ब्यान देते हैं। सभी का यही कहना था कि दोनों में बहुत प्रेम था। और दोनों एक-दूसरे के साथ बहुत खुश थे। बारिश के कारण फसल बर्बाद हो गयी थी और इस सदमें के कारण तुलसी ने आत्महत्या कर ली। पुलिस शंकर को छोड़ देती है। शंकर को अब एक बात बिलकुल जंच गयी थी कि अकेला रहना ही उसकी किस्मत है। उसकी किस्मत में न किसी का प्यार है और न ही साथ है। इसलिए वो बार बार चिराग की तरफ निहारता है और सोचता है कि अगर मेरी किस्मत में अकेले ही रहना लिखा है तो क्या चिराग भी....'नहीं नहीं मैं ये क्या सोच रहा हूँ? ये मेरे और तुलसी के प्यार की निशानी है। इसे कुछ नहीं हो सकता। पर अगर मां पिता जी और तुलसी के जैसे कभी चिराग भी...अरे मैं फिर उल्टा सीधा सोचने लगा। कुछ नही होगा चिराग को...' शंकर के मन में अब हर रोज इसी तरह के ख्याल आने लगे। एक तो तुलसी के छोड़ जाने की पीड़ा और दूसरा चिराग की फिक्र ने शंकर को बावरा बना दिया था। उसे समझ नही आ रहा कि वो क्या करे? खेतों में जाना छोड़ दिया। चौबीस घण्टे चिराग को एक पल के लिए अपने से दूर नही करता था। अगर रौशनी काकी भी कभी चिराग को खिलाने के लिए गोद में उठाती तो शंकर उसे झट से छीन लेता। एक दिन रौशनी ने शंकर को समझया कि अगर तुमको डर है कि कहीं चिराग को कुछ न हो जाये तो तुम एक काम करो। चिराग को उसके नाना नानी को दे दो। वो उनके पास रहेगा तो ठीक रहेगा और तुमको उसकी चिंता भी नही होगी। तुम मन लगा कर खेत में काम करो। चिराग को अच्छे स्कूल में पढ़ाओ। बड़ा अफसर बनाओ। उसके भविष्य के लिए थोड़ा बहुत पैसा जमा करो। इस तरह काम और खाना पीना छोड़ कर बैठना उचित नही है। बिना काम किये खाने को कहां से आएगा? बच्चे का खर्चा कैसे उठाओगे? उसके लिए काम करना जरूरी है और तुम एक ही काम कर सकते हो या तो चिराग की देखभाल या खेतों में काम...एक साथ तुम दोनों काम नही कर सकते हो। शंकर को रौशनी की बात जंच जाती है। वो तुलसी के माता-पिता को बुलाकर हाथ जोड़ कर उनसे विनती करता है कि वो चिराग की परवरिश करे। तुलसी के माता-पिता के दिमाग में ये बात बैठ गयी थी कि शायद शंकर बदनसीब है और अकेला रहना ही इसकी किस्मत में है। इसलिए वो चिराग को अपने साथ ले जाते हैं। शंकर के मन को भी अब थोड़ी तसल्ली है। उसने तय कर लिया कि अगर मेरा 'अकेला' रहना ही नियति है तो मैं अकेला ही तुलसी की यादों में बाकी का जीवन बिता लूंगा। और आज फिर शंकर 'अकेला' हो गया।

अकेला

पूरा जमावड़ा इकट्ठा हो गया था शंकर के घर के बाहर, कुछ लोग घर के आंगन में जमा थे तो कुछ लोग बाहर गली, धीरे-धीरे बात पूरे गांव में पहुंच गई थ...